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द्वारा: सुभाशीष पाणिग्रही, मारी मैत्रेयी, क्लाउडिया पोज़ो
Translated by: Manvendra Singh Thakur

इंटरनेट ने हमें व्यापक रूप से जोड़ा है, जिससे ज्ञान और यहां तक कि आवश्यक सेवाओं को साझा करने में मदद मिली है। मगर, एशिया-प्रशांत की आबादी के लगभग 15% लोग (4.8 अरब लोगों में से 700) अपनी विकलांगता के कारण वंचित रह जाते हैं। दृष्टिबाधित लोग जो अंग्रेज़ी या अन्य यूरो-औपनिवेशिक भाषाएँ नहीं बोलते, वे दुर्गम प्रारूपों, खराब स्थानीयकरण और लागत-निषेधात्मक, बंद प्रौद्योगिकियों के कारण अधिक हाशिये पर धकेल दिए जाते हैं। यहीं पर Accessibility, Language, and Tech for the People (ALT) नामक ‘अनुसंधान-कार्य’ प्रक्रिया काम आती है। अपने मूल में, इसका लक्ष्य दृष्टिबाधित व्यक्तियों के लिए एक उपयोगकर्ता और डिजिटल ज्ञान के निर्माता दोनों रूपों में भागीदारी बढ़ाना और उनके ऑनलाइन अनुभव में सुधार करना है। ALT ‘भाषाई न्याय’ और विकलांग अधिकारों के अंतर्संबंध को मान्यता देता है और दोनों के बीच की दूरी कम करने का प्रयास करता है। यह प्रक्रिया विशेष रूप से दक्षिण एशिया क्षेत्र पर केंद्रित है, जो लगभग 650 भाषाओं और 204 से 306 मिलियन विकलांगलोगों का घर है। हमारा चल रहा उपक्रम भारत में हिंदी और बांग्ला, बांग्लादेश में बांग्ला, और पाकिस्तान में उर्दू का उपयोग करने वाले दृष्टिबाधित व्यक्तियों पर केंद्रित है।
यह महत्वपूर्ण क्यों है?
हालाँकि इंटरनेट उपयोगकर्ताओं में 75% से अधिक लोग बहुसंख्यक विश्व (Majority World) से आते हैं, अपनी मातृभाषाओं व स्थानीय भाषाओं में इंटरनेट का उपयोग करना और उस पर काम करना अब भी एक चुनौती है। यह समस्या दृष्टिबाधित व्यक्तियों के लिए और भी गहरी हो जाती है, क्योंकि वे पहले से ही तकनीकों तक पहुँचने में अनेक बाधाओं का सामना करते हैं। यह ‘अनुसंधान-कार्य’ पहल समुदाय-आधारित सह-निर्माण, सह-नेतृत्व और सह-लेखन पर ज़ोर देती है, ताकि परियोजना उन्हीं समुदायों की ज़रूरतों और आवाज़ों द्वारा संचालित हो जिन्हें वह सेवा देती है।
यह ब्लॉग ALT अनुसंधान-कार्य प्रक्रिया के सदस्यों से प्राप्त प्रारंभिक अंतर्दृष्टि को साझा करने, अपनी पसंदीदा भाषाओं में इंटरनेट का उपयोग करते समय उनके सामने आने वाली प्रमुख चुनौतियों का पता लगाने और सुधार के अवसरों पर प्रकाश डालने का प्रयास करता है।
डिजिटल पहुँच की प्रमुख बाधाओं की पड़ताल
एक बड़ी बाधा सुलभता और उपयोगिता के भेद से जुड़ी है। बहुत-सी तकनीकें तकनीकी रूप से भले सुलभ हों, वे हमेशा उपयोगकर्ता-अनुकूल नहीं होतीं, जिससे दृष्टिबाधित व्यक्तियों के लिए और जटिलताएँ पैदा होती हैं। स्नेहा, भारत में आईआईआईटी हैदराबाद के ओपन नॉलेज इनिशिएटिव्स कार्यक्रम में सीनियर रिसर्च मैनेजर, और स्वयं दृष्टिबाधित नहीं हैं, वे कहती हैं: “डिजिटल उपकरणों की सुलभता को अपने आप में एक समस्या के रूप में अध्ययन करने की ज़रूरत है। केवल ‘सुलभ’ होने का यह मतलब नहीं कि वह बहुत उपयोगकर्ता-अनुकूल भी है, सहज उपलब्ध है, या उसके लिए प्रशिक्षण और अनुकूलन की ज़रूरत नहीं होगी। इसके विपरीत, जो तकनीक उपयोगी है पर सुलभ नहीं, वह विकलांगव्यक्तियों के लिए और जटिलताएँ जोड़ सकती है।” यही बात अरविंद शर्मा, सक्षम-असिस्टेक लैब (आईआईटी दिल्ली) के प्रमुख प्रशिक्षक, जो सहायक तकनीकों से विकलांग व्यक्तियों को पढ़ना-लिखना और डिजिटल साक्षरता सिखाते हैं, वे भी रेखांकित करते हैं: “विषय तक पहुँच तो है, पर जानकारी वास्तव में लोगों तक पहुँच नहीं पाती।”
भाषा और स्थानीय विषय की गुणवत्ता दूसरी बड़ी बाधा है। कई समाधान और प्लेटफ़ॉर्म अंग्रेज़ी के अलावा अन्य भाषाओं का पर्याप्त समर्थन नहीं करते, जिससे गैर-अंग्रेज़ी भाषियों के लिए बड़ी रुकावटें पैदा होती हैं। ख़ान्सा मारिया, यूनिवर्सिटी ऑफ़ ऑक्सफ़र्ड में रोड्स स्कॉलर और पाकिस्तान में सुलभता व समावेशन की पक्षधर कहती हैं: “अन्य भाषाओं के विपरीत, हमारे पास तकनीकी समाधानों की बहुत विविधता नहीं है, इसलिए अंग्रेज़ी ही मुख्यतः मेरी तकनीकी उपयोग की भाषा बन जाती है।” इसके अलावा, स्थानीय डिजिटल सामग्री की गुणवत्ता खराब हो सकती है, और मशीन अनुवादक अक्सर अप्रभावी होते हैं। ईशान, भारत में जादवपुर विश्वविद्यालय के अंग्रेज़ी विभाग में सहायक प्रोफ़ेसर और भाषा-सुलभता कार्यकर्ता कहते हैं: “उपलब्ध मशीन अनुवादक घटिया गुणवत्ता के कारण ख़राब अनुवाद पैदा करते हैं।” भास्कर, जो बांग्लादेश में विकास हेतु आईसीटी, ई-एक्सेसिबिलिटी और विकलांग व्यक्तियों के लिए
सूचना-सुलभता के क्षेत्र में सलाहकार के रूप में काम करते हैं, बांग्ला में यूनिकोड से पहले वाले लेगेसी फ़ॉन्ट्स की वजह से उत्पन्न चुनौतियों पर भी प्रकाश डालते हैं, जिनसे विषय दृष्टिबाधित लोगों के लिए अपठनीय हो जाता है: “बांग्ला में सुलभ विषय की कमी सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। इसके अतिरिक्त, अच्छी गुणवत्ता वाले कीबोर्डों की कमी है, जिससे भाषा-इनपुट जटिल हो जाता है। बहुत से लोग आज भी यूनिकोड मानक से पहले के लेगेसी फ़ॉन्ट्स का उपयोग करते हैं, जिन्हें स्क्रीन रीडर पढ़ नहीं सकते। दृष्टिबाधित लोग ऐसे विषयों तक पहुँच नहीं बना पाते।”
मिशन एक्सेसिबिलिटी के सह-संस्थापक और वकील राहुल बजाज भारत में दृष्टिबाधित उपयोगकर्ताओं के सामने आने वाली चुनौतियों को और स्पष्ट करते हैं। वे बताते हैं कि एक बड़ी बाधा यह है कि स्क्रीन रीडर हिंदी-भाषा विषयों के अनुरूप आसानी से ढल नहीं पाते। उनके शब्दों में, “मेरे लिए व्यक्तिगत तौर पर और जितना मुझे पता है, यही चुनौती सबसे बड़ी है कि स्क्रीन रीडर हिंदी-भाषा में उपलभ्द विषयों के साथ आसानी से अनुकूल नहीं हो पाते।” यह समस्या इस बात से और बढ़ जाती है कि उपकरणों पर हिंदी आवाज़ों (वॉइसेज़) तक पहुँचना और उनके बीच बिना रुकावट स्विच कर पाना कठिन है, जिसके कारण हिंदी विषयों से जुड़ाव कम हो जाता है।
तकनीकी प्रारूप और डिजिटल विषय का स्वरूप अक्सर सुलभता में बाधाएँ पैदा करता है। दुर्गम पीडीएफ़, पुराने फ़ॉन्ट और बिना वैकल्पिक पाठ वाले ग्राफ़िकल तत्व स्क्रीन रीडर की कार्यक्षमता और उपयोगकर्ताओं की जानकारी को प्रभावी ढंग से नेविगेट करने और समझने की क्षमता में बाधा डाल सकते हैं।अरविंद बताते हैं, “जब पीडीएफ़ सुलभ तरीके से नहीं बनाई जाती, तो हमारा स्क्रीन रीडर सॉफ़्टवेयर उसे पढ़ नहीं पाता।” इसी तरह, भारत की एक
विकलांगनारीवादी, शोधकर्ता, शिक्षिका और लेखिका स्रीनिधि समझाती हैं कि स्क्रीन रीडर उपयोगकर्ता विषयों को “स्किम” नहीं कर सकते, बल्कि उन्हें “पंक्ति-दर-पंक्ति” नेविगेट करना पड़ता है, जिससे जानकारी के प्रसंस्करण का तरीका प्रभावित होता है।
निर्मिता, जो डिजिटल सुलभता और विकलांगता-सम्बंधित तकनीक के उपयोग के क्षेत्र में नीति और शोध पर काम करती हैं, बताती हैं कि छात्रावस्था में उन्हें तमिल विषयों तक पहुँचने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। संगीत का अध्ययन करते समय वे तमिल और संस्कृत जैसी भारतीय भाषाओं में गीत, पांडुलिपियाँ और संकेतन तक पहुँच नहीं बना सकीं और उन्हें केवल अंग्रेज़ी पुस्तकों में उपलब्ध ज्ञान पर निर्भर रहना पड़ा। उनका कहना है कि अनुवाद और अन्य ऐप उपलब्ध होने के बावजूद हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं के विषय अब भी समान रूप से उपलब्ध नहीं है, क्योंकि अनुवाद कमज़ोर हैं, फ़ॉन्ट पढ़ने योग्य नहीं हैं और समर्थन का अभाव है। ई-स्पीक जैसी यांत्रिक लगने वाली आवाज़ों को विभिन्न भाषाओं में समझ पाना कई लोगों के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है, क्योंकि उनका उच्चारण स्वाभाविक नहीं होता और अंग्रेज़ी लहजा रहता है। जिन लोगों को अंग्रेज़ी का ज्ञान नहीं है, उनके लिए यह तकनीक के उपयोग से विमुख करने वाला एक बड़ा कारण बनता है। वे इस बात पर ज़ोर देती हैं कि लोगों के प्रभावी रूप से तकनीक का उपयोग करने और डिजिटल परिवेश में सहजता से रास्ता बनाने के लिए प्रशिक्षण और सतत सहायता आवश्यक है, और रोज़मर्रा की ज़िंदगी के लिए सुलभ समाधानों पर ध्यान देना चाहिए। “सुलभ समाधानों की बात करें, तो मैं अपने स्मार्टफ़ोन और लैपटॉप का सबसे अधिक उपयोग करती हूँ। कंप्यूटर या फ़ोन पर एनवीडीए भाषा पैक स्थापित करना उन दृष्टिबाधित व्यक्तियों के लिए अत्यंत समर्थ समाधान हो सकता है जो अपनी मातृभाषाओं में इंटरनेट, डिजिटल विषयों और सेवाओं तक पहुँचना चाहते हैं।”
सहायक तकनीक की लागत, और इसके साथ उपलब्ध समाधानों के बारे में पहुँच, कौशल तथा जानकारी का सामान्य अभाव, मिलकर एक बड़ी बाधा बनाते हैं। ख़ान्सा वित्तीय पक्ष पर कहती हैं, “मुझे यह बहुत बुरा लगता है कि सहायक तकनीकें महँगी हैं।” भास्कर जोड़ते हैं कि अंधत्व वाले लोगों में अक्सर तकनीकी कौशल कम होता है और उपलब्ध सेवाओं के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं होती। ईशान यह भी रेखांकित करते हैं कि इंटरनेट और उपकरणों तक पहुँच बनानी होगी, ताकि जो लोग वर्तमान में इन तकनीकों से जुड़े नहीं हैं वे भी लाभ उठा सकें। वास्तव में, तकनीक तक पहुँच अक्सर सामाजिक विशेषाधिकार से जुड़ी होती है। ईशान के अनुसार, उपमहाद्वीप में हाशिये पर स्थित वर्ग, जाति और अन्य सामाजिक अवस्थाओं से आने वाले अनेक दृष्टिबाधित लोग तकनीकी लाभों से पूरी तरह वंचित रह जाते हैं।
सुलभ तकनीक की संभावनाएँ
आगे की राह, जैसा कि साक्षात्कारित लोगों ने देखी है, तकनीक और समुदाय का सहारा लेकर वास्तविक पहुँच और आत्मनिर्भरता बनाना है। सहायक तकनीकें सशक्त बना सकती हैं, जैसा कि अरविंद रेखांकित करते हैं, “हमारा स्क्रीन रीडर हमें सब कुछ बता देता है।” वे आगे कहते हैं, “मुझे यह बहुत पसंद है, यह शक्तिशाली है। यह एक ऐसा आविष्कार था, जिसने हमारे जीवन को मुक्ति दिलाई। आप स्क्रीन रीडर का उपयोग करके हिंदी विषयों तक पहुँच सकते हैं।” स्नेहा भौतिक समायोजनों और डिजिटल सुलभता के बीच समानताएँ सुझाती हैं, जैसे छवि-विवरण (alt text) जोड़ना, रंग-विपरीतता सुनिश्चित करना, और सुलभ भाषा का उपयोग करना, ताकि दृष्टिबाधित लोगों के लिए इंटरनेट अधिक उपयोगी हो सके। ख़ान्सा पहुँच का दायरा बढ़ाने और स्वतंत्रता में वृद्धि के महत्व पर ज़ोर देती हैं। उनका दृष्टिकोण ज्ञान-साझेदारी, पक्षधरता और एकजुटता के लिए सामुदायिक स्थान बनाना भी शामिल करता है। वे कहती हैं, “बहुत-सा ज्ञान मौजूद है और बहुत-से लोग मदद करना चाहते हैं। एक स्थान बनाने से इन समुदायों के भीतर मौजूद ज्ञान सामने आ सकता है, समस्याएँ सुलझाने में मदद मिल सकती है, ताकि हम साथ आकर पक्षधरता करें, समुदाय बनाएँ, संसाधन और स्थान साझा करें। जब तकनीक निराश करती है, तब हमें साथ आकर सामूहिक रूप से आवाज़ उठानी चाहिए।”
भास्कर स्पीच-टू-टेक्स्ट और एआई के व्यावहारिक लाभों पर ज़ोर देते हुए बताते हैं: ”स्पीच-टू-टेक्स्ट के साथ मैं बोलकर आसानी से टाइप कर सकता हूँ। यह मेरे लिए बहुत बड़ा समाधान है। एक सुलभ समाधान लोगों की ज़िंदगी बदल सकता है।” वे यह भी बताते हैं कि एआई अब वस्तुओं और व्यक्तियों को पहचानने की क्षमता में बेहतर होता जा रहा है, जिससे रोज़मर्रा के नेविगेशन में सुधार होता है, और एक एकल, पूरी तरह से सुलभ प्लेटफ़ॉर्म के सपने की ओर भी इशारा करते हैं।
स्रीनिधि, हालाँकि स्वयं दृष्टिबाधित नहीं हैं, ओसीआर और एआई-आधारित छवि-वर्णन में हुई प्रगति को पहचानती हैं और कहती हैं, “तीन साल पहले की तुलना में अब ओसीआर कहीं बेहतर है। अब चैटजीपीटी, फेसबुक से बेहतर इमेज डिस्क्रिप्शन लिखता है..” फिर भी वह टेक-विकास समुदाय में विकलांगता की अधिक सूक्ष्म समझ की माँग करती हैं और कहती हैं, “बहुत कम लोग ऐसी तकनीक पर काम कर रहे हैं जो विकलांगता के अनुभवों की बारीकियों को समझ सके। कई तरीकों से एआई ने विकलांग व्यक्तियों, खासकर अंधत्व के साथ रहने वालों, के जीवन को बेहतर बनाया है।”
ईशान यूट्यूब जैसे प्लेटफ़ॉर्म की भूमिका पर प्रकाश डालते हैं और आसानी से उपलब्ध ऑडियोबुक्स की प्रचुरता पर ज़ोर देते हैं।वे कहते हैं, “यूट्यूब ने एक क्रांति पैदा की है, जिसने उपयोगकर्ताओं को विविध ऑडियो-विज़ुअल विषयों, जिनमें ऑडियोबुक्स भी शामिल हैं, बनाने की अनुमति दी है।” वे यह भी बताते हैं कि बांग्ला में विकलांगता-पक्षधरता के लिए सोशल मीडिया का निरंतर उपयोग हो रहा है और वे वीडियो विषयों में कैप्शन या ऑडियो डिस्क्रिप्शन जोड़ने जैसे व्यावहारिक सुधारों का आग्रह करते हैं।
निर्मिता ने तकनीक की सशक्तकारी संभावनाओं पर भी ज़ोर दिया। एनवीडीए से सुसज्जित स्मार्टफ़ोन और लैपटॉप को “शक्तिशाली समाधान” बताया गया है, जो स्वतंत्रता और दैनिक जीवन-यापन को संभव बनाते हैं। ये दृष्टिबाधित व्यक्तियों को जानकारी तक पहुँचने, काम करने और मनोरंजन में भाग लेने की सुविधा देते हैं। उन्होंने रिमाइंडर के लिए अलेक्सा के उपयोग का भी उल्लेख किया, जो रोज़मर्रा के कार्यों में वॉइस-एक्टिवेटेड तकनीक की क्षमता को रेखांकित करता है। सीमाओं को स्वीकारते हुए, विशेषकर कुछ समाधानों के अंग्रेज़ी-केंद्रित स्वरूप को, निर्मिता का अनुभव स्पष्ट दिखाता है कि तकनीक विभाजनों को घटा सकती है और जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में भागीदारी को आसान बना सकती है।
भविष्य में, निर्बाध डिजिटल जुड़ाव के लिए मज़बूत हिंदी टेक्स्ट-टू-स्पीच समाधानों का विकास बेहद ज़रूरी है।जैसा कि राहुल ज़ोर देकर कहते हैं, “हमें फ़ोन और कंप्यूटर दोनों पर ऐसे अच्छे हिंदी टेक्स्ट-टू-स्पीच समाधान चाहिए जो आसानी से इंस्टॉल हो जाएँ और विषयों के सामने आते ही अंग्रेज़ी से हिंदी में अपने आप स्विच कर सकें, ताकि कहीं भी रुकावट न हो…” ऐसी प्रगति बाधाओं को काफ़ी हद तक कम करेगी और दृष्टिबाधित हिंदी भाषियों के लिए ऑनलाइन अनुभव को बेहतर बनाएगी।
आगे की राह
इन अनुभवों से यह स्पष्ट है कि इंटरनेट की अपार संभावनाओं के बावजूद, डिजिटल पहुँच के माध्यम से स्वतंत्रता और सम्मान की राह में आने वाली बाधाएँ अभी खत्म नहीं हुई हैं। दक्षिण एशिया के 6.12 करोड़ दृष्टिबाधित लोग इन बाधाओं का सामना करते हैं, और जो अंग्रेज़ी तथा यूरो-औपनिवेशिक भाषाओं के अलावा अन्य भाषाएँ बोलते हैं, वे और अधिक हाशिये पर चले जाते हैं। जिन बाधाओं पर चर्चा हुई, वे यूनिकोड-अनुपालन की कमी, जटिल दक्षिण एशियाई लिपियों के लिए पीडीएफ सुलभता, पाठ-आधारित विवरण (alt text), बुनियादी उपयोगिता, भाषा समर्थन, तकनीकी स्वरूपण, सहायक तकनीकों की लागत, तथा प्रशिक्षण और समुदाय-आधारित सह-निर्माण कार्यक्रमों से जुड़ी हैं। ये सभी मिलकर चुनौतियों का एक जटिल जाल बनाती हैं, जिनका तत्काल समाधान आवश्यक है। इन बाधाओं को पहचानना और समझना, उन्हें समाप्त करने की दिशा में पहला कदम है। जैसा कि साक्षात्कारकर्ताओं ने बताया, इन बाधाओं को दूर करके ही डिजिटल दुनिया सभी के लिए, भाषा, योग्यता या सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि की परवाह किए बिना, वास्तव में एक समान स्थान बन सकती है।
प्रतिभागियों की अग्रणी भूमिकाएँ और उनकी अंतर्दृष्टियाँ प्रगति के लिए एक रोडमैप प्रस्तुत करती हैं, जिनमें सुलभ तकनीक, स्क्रीन रीडर, स्पीच-टू-टेक्स्ट, एआई-आधारित उपकरण और यूट्यूब जैसे ऑनलाइन विषय-साझाकरण मंच शामिल हैं। सुलभता के मुद्दों को हल करने के लिए अनेक हितधारकों का सक्रिय कदम उठाना आवश्यक है, मुद्दों की गंभीरता चाहे जैसी हो। इसलिए, समाधान की माँग के लिए समुदाय-आधारित, समन्वित पक्षधरता ज़रूरी है। ALT का उद्देश्य बांग्ला, हिंदी और उर्दू के दृष्टिबाधित उपयोगकर्ताओं के कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों का दस्तावेज़ तैयार करना है, ताकि जमीनी स्तर की सामुदायिक पक्षधरता को सशक्त किया जा सके।
हमें लगता है कि यह काम केवल तकनीक भर का नहीं है, बल्कि वितरित शक्ति, ज्ञान, न्याय और यह सुनिश्चित करने का है कि दृष्टिबाधित लोग डिजिटल दुनिया में पूर्ण रूप से भाग ले सकें। हमारे सहकर्मी पहले से ही सत्ता-संरचनाओं को चुनौती दे रहे हैं, और हमें आशा है कि उन्हें सुलभता की माँग करने के लिए अधिक साक्ष्य-आधारित संसाधन मिलेंगे। 2026 में ATL से जुड़े अद्यतनों के लिए जुड़े रहें!
टिप्पणी: स्पष्टता के लिए कुछ उद्धरण संपादित किए गए हैं।
परिचय
अरविंद शर्मा, सक्षम और असिस्टेक लैब, आईआईटी दिल्ली की संयुक्त पहल में मास्टर ट्रेनर के रूप में काम करते हैं, जहाँ वे सहायक तकनीकों का उपयोग करके विकलांग व्यक्तियों को पढ़ना, लिखना और डिजिटल साक्षरता विकसित करना सिखाते हैं।
क्लाउडिया पोज़ो, Whose Knowledge? में ऑनलाइन ज्ञान और ज्ञान-न्याय (epistemic justice) के लिए कार्यरत शोधकर्ता और समन्वयक हैं।
ईशान चक्रवर्ती, जादवपुर विश्वविद्यालय के अंग्रेज़ी विभाग में सहायक प्रोफेसर हैं, और भाषा तथा सुलभता के कार्यकर्ता हैं।
खानसा मारिया, ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में रोड्स स्कॉलर हैं, वे विकलांगता सलाहकार तथा सुगम्यता और समावेशन की पक्षधर हैं।
मारी मैत्रेयी, Whose Knowledge? में ऑनलाइन ज्ञान और ज्ञान-न्याय (epistemic justice) के लिए कार्यरत शोधकर्ता और समन्वयक हैं।
निर्मिता नरसिम्हन , बौद्धिक संपदा सुधार और विकलांग व्यक्तियों के लिए प्रौद्योगिकी पहुंच से संबंधित नीति अनुसंधान और पक्षपोषण पर काम करती हैं।
पुथिया पुरायिल स्नेहा, ओपन नॉलेज इनिशिएटिव्स प्रोग्राम, राज रेड्डी सेंटर फॉर टेक्नोलॉजी एंड सोसाइटी, इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ओएफ इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी, हैदराबाद में वरिष्ठ अनुसंधान प्रबंधक हैं।
राहुल बजाज. मिशन एक्सेसिबिलिटी के सह-संस्थापक हैं।
सुभाशीष पाणिग्रही, सामाजिक उद्यमिता, डिजिटल अधिकार, समुदाय-निर्माण और भाषा-प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अनुभव रखने वाले एक ग़ैर-लाभकारी लीडर हैं।
स्रीनिधि राघवन, एक विकलांगनारीवादी, शोधकर्ता, शिक्षिका और लेखिका हैं; उनका काम कामुकता, जेंडर, विकलांगता और तकनीक के अंतर्संबंधों पर केंद्रित है।
भास्कर भट्टाचार्य, विकास हेतु आईसीटी, ई-एक्सेसिबिलिटी और विकलांग व्यक्तियों के लिए सूचना-सुलभता के क्षेत्र में काम करते हैं।



